इतिहास की हवा और भविष्य की दवा इंदौर नगर निगम चुनाव के लिए दोनों ज़रूरी है



 निकाय चुनाव इंदौर : सिर्फ आज के लिए नहीं इतिहास के लिए भी वोट डालिए

एक ज़माना था जब भारत एक कृषि प्रधान देश हुआ करता था, आजकल भारत सोशल मीडिया प्रधान देश हो गया है| पहले साल में चार मौसम आते थे अब सोशल मीडिया की मेहरबानी और टी वी मीडिया की कद्रदानी से भारत में पूरे साल चुनाव का मौसम बना ही रहता है|

इस साल चुनाव के मौसम में सरसंघचालक मोहन भागवत जी  और असदउद्दीन ओबेसी जी ने इतिहास की बयार बहा दी है|दोनों की ही बात एक दम सही है|  जब भागवत जी कहते हैं की इतिहास को छोड़ कर भविष्य में देखो तो वो इशारा करते है उस कल की ओर जिसे आज हम जाने अनजाने में बुन रहे हैं| जिस वक्त ओबेसी कहते है की इतिहास से सबक लो, दूध को फूँक फूँक कर पियो तो वो भी गलत नहीं है|

इतिहास की हवा और भविष्य की दवा इंदौर नगर निगम चुनाव के लिए दोनों ज़रूरी है

क्या आपने सोचा है की सफाई के मामले में नंबर वन होने का जो रिकॉर्ड इंदौर ने बनाया है उसके पीछे इतिहास का भी कोई अध्याय जुड़ा हो सकता है? संजय दृष्टि के पिछले कई अंको में मैंने बार बार कहा की इंदौर जैसे शहर सफाई में अव्वल  नंबर इसलिए भी हैं क्यूंकि यहाँ ले लोग जागरूक हैं| इंदौर सफाई पसंद शहर है ये बात एक या दो दशक पुरानी नहीं है, सच तो ये है की इंदौर के लोग अंग्रेजो के ज़माने से सफाई पसंद थे|

आज भले ही इंदौर की गिनती चौदहवे या पंद्रहवे महानगर के तौर पर होती हो, मगर सिविक सेंस के बारे में इस शहर की वाशिंदों की आधुनिक सोच  डेढ़ सौ साल पुरानी है| ये बात हम नहीं कह रहे, ये बात कह रहा है शहर का इतिहास|

इंदौर शहर के प्रमुख इतिहासकार एवं नगर निगम सम्बन्धी मामलो के विशेषज्ञ श्री किशोर कोडवानी के अनुसार इस बात के प्रमाण है की डेढ़ सौ साल पहले इंदौर,  सफाई व्यवस्था को लेकर बनी देश की चौथी नगर निगम थी| उनके द्वारा प्रस्तुत लेख के अनुसार...

             ब्रिटिश गवर्नरी ने इन्दौर कि सफाई को लेकर दिल्ली रिपोर्ट भेजी इसी बिच राजवाड़ा क्षेत्र कि गंदगी को लेकर होलकर महाराज से शहर व्यापारी प्रमुख जन मिले 1870 में नगर सेविका कि स्थापना कि गयी 1873 गज़ट प्रकाशन हुआ, 1909 में एक्ट बना 1920 में प्रथम बार निर्वाचन हुआ 1870 से 1919 तक मनोनीत सदस्यों द्वारा संचालित होती रही है 1687 चान्नई (मद्रास), 1887 ग्वालियर, 1889 मुबंई, निगम गठित हुई ।“ ( श्री किशोर कोडवानी जी  की कलम से साभार)

 

एक पत्रकार नहीं, समाजशास्त्री की हैसियत से मैं ये कहना चाहता हूँ की इस साल नगर निगम के चुनाव में मतदान करते समय ये तथ्य याद रखा जाए की आज जिस इंदौर की आबोहवा में हम सांस ले रहे हैं उसका सपना दरअसल  डेढ़ सौ साल पहले देखा गया था| कल्पना कीजिये, जो सोच आज से डेढ़ सौ साल पहले इस शहर को चलाने में मदद कर थी अगर उसकी ऊर्जा बरक़रार रहती तो शायद हम आज भारत के प्रमुख चार शहरो में गिने जाते|

ज़रा सोच कर देखिये, आज आप जो वोट डालेंगे वो ये फैसला भी करेगा की क्या इंदौर आने वाले समय में मध्य भारत का ऐसा महानगर बन कर उभरेगा जो टॉप फाइव शहरो को टक्कर दे सकें जैसे की इस शहर में बसे हमारे पूर्वजो ने डेढ़ सौ साल पहले किया था जब उन्होंने, आधुनिकता की पहली बानगी दिखाई थी|



 

 

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