मुखिया मुख सो चाहिए, या मोदी सो सेवक ?





जाति आधारित जनगणना आवश्यक है या नहीं ? लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का व्यक्तित्व प्रदर्शित करती Statue of Unity, इस प्रश्न के बारे में क्या सोच रही होगी?

भारत की लोकतान्त्रिक यात्रा किस दिशा में अग्रसर है इसका अंदाज़ा कुछ तथ्यों और बयानों से लगाइये|  पिछले दिनों मोदी जी ने खुद कहा  की नए मंत्रिमंडल विस्तार में बी सी चेहरों को  जगह मिली है और इस बात से विपक्ष नाखुश है|

https://www.amarujala.com/india-news/prime-minister-narendra-modi-s-cabinet-sc-st-obc-ministers-from-every-community-included

अब मोदी जी के इस बयान का तुलनात्मक अध्ययन सुश्री कंगना रानावत द्वारा दिए गए एक बयान की रोशनी कीजिये,  कंगना जी ने अपने बयान में ब्राह्मणों की तुलना इक्कीसवी सदी में उपजे नए दलितों से की है| सुश्री कंगना रानावत के इस बयान को ब्राहमण वर्ग का पूरा समर्थन मिला है|

https://www.jagran.com/jharkhand/jamshedpur-kangana-ranaut-said-brahmin-of-india-is-real-dalit-in-today-s-era-21895368.html

ऐसा लगता है जैसे अनेकता में एकता के सिद्धांत पर स्वर्गीय सरदार वल्लभ भाई पटेल द्वारा एक सूत्र में बांधे गए इस देश को राजनेता एक और नए विभाजन की ओर धकेल रहे हैं| आज़ादी से पहले के राजघराने जातियों और वंश बेलो पर आधारित थे, आज मोदी जी के भारत में एक बार फिर से नए  जाति आधारित कॉर्पोरेट राजघरानो की सरंचना शुरू हो गई है| किसी अल्पसंख्यक जाति का नेता अघोषित कॉर्पोरेट फंडिंग के साथ मैदान में उतरता है और एक नए राजघराने का निर्माण शुरू होती है|  इस नए राजघराने की ताजपोशी होती है उस वर्ग विशेष या जाति विशेष को आरक्षण की Luxury प्रदान करके| समाजवाद के नाम पर सामंती सत्ता फैलाये ऐसे बहुत से घराने और उनके चश्मों-चिराग आपको भारत के राजनेतिक पटल पर आराम से नज़र आयेंगे|

आरक्षण अन्त्योदय के लिए या फिर मंत्री पद और सत्ता का शोर्ट कट ?

आरक्षण की बुनियादी परिकल्पना इशारा करती है एक ऐसी व्यवस्था की ओर जहाँ पर समाज के सबसे निचले तबके को पढ़ाई लिखाई और अन्य सुविधाये देकर मुख्य धारा में लाने प्रयास किया जाए, यानी आरक्षण अन्त्योदय के लिए निर्धारित किया है|

अगर माननीय मोदी जी का आशय ये है की वो जाति  के आधार पर मंत्री पद बाँट कर अन्त्योदय कर रहे हैं तो ये लोकतंत्र की भावना की अनादर है|अगर उनका ये आशय नहीं है तो फिर इस बयान के क्या मायने हो सकते हैं ये अनुसन्धान का विषय है|

मंत्री पद दिया जाना चाहिए योग्यता और सोशल सर्विस प्रोफाइल के आधार पर, मगर प्रधानमंत्री जी के बयान से ऐसा भी लगता है जैसे उन्होंने मंत्री पद जाति के आधार पर बांटे हैं, ये स्थिति उन मंत्रियो के लिए भी अपमानजनक मानी जा सकती है जो अपनी योग्यता के आधार पर मंत्री बने है मगर उनकी उपलब्धियों पर जाति विशेष का टैग लगा दिया गया है|

मुखिया मुख सो चाहिए, या सेवक मोदी सो चाहिए

भारत एक वेलफेयर स्टेट है, मगर साथ ही साथ यहाँ का संविधान नागरिको को समानता का अधिकार भी देता है| ऐसे में कंगना जी द्वारा उठाया गया मुद्दा वाकई एक गंभीर समस्या की ओर इशारा करता है, श्री नरेन्द्र मोदी जी का बयान तो कंगना द्वारा प्रस्तुत किये गए तथ्य की पुष्टि भर है|

सुश्री कंगना जी के बयान के बाद एक सवाल और उठता है,  मंत्रिमंडल द्वारा प्रद्दत की गयी शासन व्यवस्था में ऐसी क्या कमी है की माननीय श्री मोदी जी को मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान मंत्रियो की जाति, वर्ग या फिर लिंगानुपात की ओर इशारा करना पड़ा ?

 क्या हम ये मान ले की मंत्री और बाकी प्रशासनिक पदों पर बैठे लोग जाति को आधार मानकर सेवाओ का निष्पादन करते हैं| आज जब नीति आयोग के आगमन के बाद योजनाओ के गठन और कार्यान्वन का ढांचा ही बदल गया है,  तब भी उच्च स्तर की प्रशासनिक सेवाओ में अगर जाति एक आधार के तौर पर serve होती है तो फिर समझ लीजिये, सरकार का पोस्टर बदला है, थिएटर में अब भी पुरानी फिल्म चल रही है और कुर्सियों को जाति का दीमक अब भी लगातार चाट रहा है|





कंगना रानावत जी बिलकुल सही कह रही है| ब्राह्मणों को चुनावी प्रक्रिया के स्तर से ही अपने प्रतिनिधित्व के बारे में सोचना चाहिए, अन्यथा वो दलित की जगह कहीं अति पिछड़ा वर्ग के सदस्य ना बन जाए|

 संविधान की शपथ हो या फिर  लोक व्यवहार का नैतिक पैमाना हो, मंत्री पद पर आसीन व्यक्ति को जाति और लिंगभेद जैसे विषयों से परहेज़ करना चाहिए और “ Each according to capacity & each according to necessityके universal principle पर काम करना चाहिए| श्री मोदी जी द्वारा किसी जाती या वर्ग का special mention इशारा करता है की कहीं कोई कमी है|

Collective Bargain in democracy versus over democracy

आदर्श लोकतंत्र की परिभाषा साफ़ कहती है लोकतंत्र का आधार होना चाहिए, संविधान और राष्ट्र के सिद्धांत| किसी फंतासी कहानी के लेखक की क्षमता में मुझे ऐसा लग रहा है जैसे सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा, सुश्री कंगना रानावत और उन जैसे भारतीयों नागरिको की Voice में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों से एक सवाल पूछ रही है, जिसका जवाब यदि आपके पास हो तो कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखियेगा| ये सवाल कुछ इस तरह है|

मैंने लोकतंत्र बनाया ताकि समान विचारधारा के लोग निरकुंश सत्ता पक्ष पर लगाम लगा सके, मगर आरक्षण और जातिवाद की वेदी पर ये देश कहीं Over democracy का शिकार तो नहीं हो रहा? आज जिन्हें हमने मुखिया बनाया है वो मुख की तरह सुविधाओ को बराबरी से बाँट रहे हैं या फिर जातियों के सेवक बनकर आधुनिक भारत के नए राजघरानो के गठन मेंगेहुंए राष्ट्रवादी अंग्रेजोकी भूमिका निभा रहे हैं|





 

 

 

 

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