Indore Mayor Election 2021: कमलनाथ गरजे, याद रहे, इंदौर का हर घर पूरी तरह कांग्रेस या बीजेपी का घर नहीं है

 

पूर्व मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ जी ( Kamalnath)  ने 2021 के निकाय चुनाव के मद्देनज़र आयोजित कांग्रेस कार्यकर्ता सम्मलेन में कार्यकर्ताओं को इस चुनाव का सबसे बड़ा मंत्र दिया| उन्होंने कहा की “सोशल मीडिया के आने के बाद युवा वर्ग  को जानकारी मिलने के कई नए माध्यम मिले हैं| जिसका सबसे बड़ा असर ये हुआ है की आज इंदौर के हर घर में अलग अलग Political ideology के लोग पाए जाते हैं| बीजेपी हो या कांग्रेस, कोई भी ये दावा नहीं कर सकता की ये घर मेरा है या मेरा है”|

परिवर्तन की बयार तोड़ेगी सत्ता पक्ष का खुमार

कमलनाथ जी के इस बयान को “Voter Behavior Survey” से भी जोड़ा जा सकता है, ये एक बयान, राष्ट्रवाद पर उठ रहे सारे Debates को भी एक्सप्लेन कर सकता है और सबसे ज़रूरी बात, ये बयान एक आम कार्यकर्ता को लोकतंत्र द्वारा दी गयी वैचारिक स्वतंत्रता का सम्मान करने की सीख देता है| एक तरफ मीडिया के दूसरे धड़े कमलनाथ जी के बयानों में सनसनी ढूंढ रहे थे वही, कमलनाथ जी अपने सादे और सधे शब्दों में कार्यकर्ताओ को Consumer  ( Voter) Behavior का पाठ पढ़ा रहे थे| सीबीआई न्यूज़ द्वारा किये गए Participative & qualitative सर्वे में भी ये बात सामने आई की युवा वर्ग का मतदाता अपनी राय और अपनी Political Ideologies को ध्यान में रख कर वोट डालना चाहता है| यकीनी तौर पर ये वक्त की ज़रूरत भी है, इस देश में पंडित जवाहरलाल नेहरु द्वारा दिए गए “ Unity in diversity” को राष्ट्रवाद का पैमाना माना जाए, या फिर श्री प्रवीन तोगडिया और सुदर्शन न्यूज़  द्वारा प्रतिपादित आक्रामक राष्ट्रवाद को तरजीह दी जाए इस मामले में हर किसी की अपनी चॉइस हो सकती है और लोकतंत्र में अपनी चॉइस रखने में कोई बुराई या गलती नहीं है|



कहीं भाजपा ने Silent Majority को Silence of the Lambs तो नहीं बना दिया है

Silence of the Lambs एक अंग्रेजी मुहावरा है, जिसका मतलब है सभ्य इंसानो की दर्द भरी चुप्पी, आज के परिपेक्ष्य में इसे किसान आन्दोलन से जोड़ा जा सकता है जहाँ पर सरकार उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है| इस मुहावरे को हम उस वोटर वर्ग से भी जोड़ सकते हैं जिसने भाजपा को वोट दिया मगर आज व्यथित है क्यूंकि किसान आन्दोलन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर उसकी राय भाजपा की वर्तमान गतिविधियो से नहीं मिलती है| कमलनाथ जी के आक्रामक बोल भी शायद इसी तरफ इशारा कर रहे थे|



कमलनाथ के भाषण में दूसरी सबसे ज़रूरी बात थी भाजपा के दुष्प्रचार की कला, उन्होंने लगातार कार्यकर्ताओ को याद दिलाया की महंगाई और बेरोज़गारी के मुद्दे पर चुनाव लड़े जाते हैं और बाद में राम जन्म भूमि और पाकिस्तान के मुद्दे में लोगो को व्यस्त कर दिया जाता है|  कमलनाथ जी की इस बात का आंकलन इस बात से भी किया जा सकता है पिछले दिन कृषि कानूनों के बारे फैली हुयी भ्रांतियों को दूर करने के लिए जिन सात सौ जनसभाओ की बात की गयी थी उन्हें पुल ऑफ करने में बीजेपी कार्यकर्त्ता पूरी तरह नाकाम रहे | विगत दिनों हुए भाजपा के सम्मलेन में आदरणीय मोदी जी को कहना पड़ा की सत्ता में होने का ये मतलब नहीं है की पार्टी का कार्यकर्ता आम जनमानस से दूरी बना ले| आज मोदी जी को मानना पड़ा है की कार्यकर्ताओ और जनमानस के बीच की दूरी बढ़ी है और इसी दूरी ने silence of the majority को silence of the lambs भी बना दिया है|



कम संपर्क बनाम सघन जन संपर्क

इंदौर में आयोजित कांग्रेस संभागीय कार्यकर्ता सम्मेलन में 21 विधायक और 12 जिल्हा अध्यक्ष शामिल हुए मंच पर डॉ विजय लष्मी साधो, जीतू पटवारी, विशाल पटेल, कांतिलाल भूरिया, प. कृपा शंकर शुक्ला, अश्विन जोशी, चिंटू चौकसे, पूर्व मेयर विभा पटेल , यूथ कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष विक्रांत भूरिया ,प्रेमचंद गुड्डू , सुरजीत सिंह चड्डा के साथ के कई गणमान्य मौजूद थे | इन सभी को अपना साक्षी बनाते हुए कमलनाथ जी ने अपने भाषण में स्पष्ट कहा की भाजपा कार्यकर्ताओं की तरह किसी कांग्रेस कार्यकर्ता को जनता के बीच जाने में शर्माना नहीं चाहिए, हमने पंद्रह महीने जनता की इमानदारी से सेवा की, प्रान्त को माफिया के चंगुल से छुड़ाने का प्रयास किया और बाद में हम लोकतंत्र की हत्या का शिकार हुए|



 कमलनाथ जी के इस वक्तव्य को सडक पर दिख रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओ के जोश से भी जोड़ा जा सकता है| इस अवसर पर उपस्थित कांग्रेस के अन्य पदाधिकारियों ने भी भाजपा की नीतियों को जम कर कोसा, श्री विनय बाकलीवाल,  और फौजिया शैख़ अलीम जैसे वक्ताओं ने बड़े गरिमामयी ढंग से बीजेपी द्वारा प्रचारित “हमारा विकल्प कहाँ से लाओगे” के नारे को सच का आइना दिखाया| इस मंच पर कई वक्ताओं ने कहा की अगर सरकार चलाने के एक्सपीरियंस सर्टिफिकेट की बात है तो सबसे ज्यादा सर्टिफिकेट आज भी कांग्रेस के पास है, उनके कहने का आशय ये भी था की जिन्हें सरकार चलाने का अनुभव नहीं है वो आज निजीकरण करके अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं|



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