Indore Mayor Election 2021: पंजाब निकाय चुनावो में किसान आन्दोलन के Ripple Effect का वार, अबकी बार सकते में सरकार

जिस तरह ठहरे पानी में कंकर फेंकने पर उठे हुए ripples किनारे तक जाते हैं ठीक उसी तरह लगता है की किसान आन्दोलन का Ripple Effect इस बार पंजाब में हुए नगरीय निकाय चुनावो में नज़र आया है| यहाँ कई जगहों पर तो बीजेपी अपना खाता तक खोलने में नाकाम रही है|



कहते हैं मतदाता के डंडे में आवाज़ नहीं होती, ये तो बस पड़ता है

हमेशा की तरह कांग्रेस मुक्त भारत का नारा लेकर मैदान में उतरी बीजेपी को इस इलेक्शन में मूंह की खानी पड़ी और पंजाब अब तकरीबन पूरी तरह से बीजेपी मुक्त हो गया है| किसान आन्दोलन के शुरूआती दिनों में बीजेपी की और से Silent Majority का नारा भी बुलंद किया गया था| |इस समय बीजेपी प्रवक्ताओ ने नारा बुलंद किया था की किसान आन्दोलन का प्रभाव सिर्फ पंजाब में है और कैप्टेन साहिब की सरकार इसे अपरोक्ष रूप से प्रायोजित कर रही है| उनका ये भी कहना था की किसान आन्दोलन का असर शहरो में बिलकुल भी नहीं है| मगर इस बार पंजाब में हुए नगरीय चुनावो ने साबित कर दिया की बीजेपी का हर दावा खोखला है और पार्टी अब आलिशान एयर-कंडिशन्ड दफ्तरों में सिमट कर रह गयी है| साइलेंट मेजोरिटी यानी मतदाता की सही आवाज़ तो इन चुनावो में सुनाई दी है जहाँ उन्हें शून्य का स्कोर मिला है|



साइलेंट मेजोरिटी की आवाज़ और राज्यों में भी सुनाई दी है

पिछले दिनों हुए निकाय चुनावो में हरियाणा, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों में बीजेपी को उत्साहजंनक परिणाम नहीं मिले हैं| पंजाब के नतीजो ने ये साबित कर दिया की अगर टिकेत (Tickait) अपने दल बल के साथ सिंघु बॉर्डर और गाज़ीपुर बॉर्डर पर डटे रहे तो संसद की बची खुची कुर्सियों से भी भगवा रंग साफ़ होना शुरू हो जाएगा| किसान आन्दोलन की हरियाली संसद में पहुँच जाए तो राजनेतिक विशेषज्ञों को कोई ताज्जुब नहीं होगा क्यूंकि नगरीय निकाय के चुनावो में, भारत के नगरो का मिजाज़ भी समझ आया है जहाँ पर गाँवों में चल रहे विरोध का असर पहुंचा है|

किसानो की बलिहारी है क्यूंकि किसानो के बाद शहरो की बारी है

बहुत सारे राजनेतिक विशेषज्ञों का मानना है की नगरो में बसे लोग किसान आन्दोलन को सरकार के निजीकरण ड्राइव से जोड़ कर देख रहे हैं, उनका मानना है की जो किसानो के साथ हो रहा है वैसा ही कुछ सरकारी कर्मचारियों और बाकी व्यवसायों के साथ हो सकता है क्यूंकि सरकार निजीकरण की पक्षधर है| कितना सच कितनी अफवाहे ये तो कहना मुश्किल है मगर किसान आन्दोलन की  वजह से नगरो में बसी जनसंख्या को लग रहा है की धीरे धीरे बाकी बिज़नस सेक्टर्स में औधोगिक घरानों की मोनोपोली आ सकती है|

क्या इस बार मोदी जी की Delay Tactics, fail हो जायेगी

मोदी जी की रणनीति रही है की वो ठंडा करके खाते हैं, यानी एक दम अंत में बोलते हैं| किसान आन्दोलन के साथ भी ऐसा ही हो रहा है क्या, सबसे पहले इसे कांग्रेस का आन्दोलन कहा गया, फिर इसके तार खालिस्तान और आई एस आई से जोड़े गए, आजकल मीडिया किसान आन्दोलन की खबरे कम और ग्रेटा थनबर्ग की टूल किट को ज्यादा महत्व दे रही है| मगर सबसे बड़ी बात ये हुयी है की आज तक, इंडिया टीवी और जी न्यूज़ इस बार नगरीय दर्शको का ध्यान भटकने में नाकाम रहे हैं| किसान आन्दोलन किसी फसल की तरह बढ़ता जा रहा है जिसकी कटाई चुनावों में लगातार हो रही है|



मध्य प्रदेश मैं हो रहे निकाय चुनावो में जिस तरह डिले हो रहा है उसके मद्देनज़र पिछले दिनों एक याचिका दायर की गयी थी" पिछले दिनों चुनाव आयोग ने अपना पक्ष हाई कोर्ट के सामने रखा और कहा की वो चुनाव के लिए तैयार है और उन्हें बस  सरकार की हरी झंडी का इंतज़ार है, मगर शिवराज सिंह की सरकार का पक्ष इस मामले में आना अभी बाकी है| अब सवाल ये है की जिस तरह किसान आन्दोलन के बाद हो रहे चुनावो में बीजेपी को हार मिल रही है, क्या उसे मध्य प्रदेश के चुनावो में हो रहे विलम्ब से जोड़ कर देखा जा सकता है |

  

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