विज़न मुरेना २०२१: क्या इक्कीसवी सदी की Economic वर्चस्व की लड़ाई छोटे शहरो और रिमोट कस्बो में लड़ी जायेगी?



आज का सुजीत-नामा दो ज्वलंत सवालो से शुरू करते हैं| ऊपर से देखने में आपको लगेगा की इन दोनों सवालो में कोई कनेक्शन नहीं है, मगर जब आप इस रिपोर्ट के तीसरे पैराग्राफ पर पहुंचेगे तो आपको समझ आएगा की एक प्रॉपर बस स्टैंड टर्मिनल की कमी से शहर को कितने बड़े बड़े नुक्सान हो सकते हैं|

पहला सवाल

क्या इक्कीसवी सदी की Economic वर्चस्व की लड़ाई छोटे शहरो और रिमोट कस्बो में लड़ी जायेगी?

दूसरा सवाल

क्या आप मुरेना बस स्टैंड से मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के अन्य जिलो के लिए बस सेवा का डायरेक्ट लाभ उठा सकते हैं?

मुरेना मध्य प्रदेश के बाकी जिलो से सीधे सीधे कनेक्टेड नहीं है?

अगर आप चाहते है की आपको जयपुर के लिए मुरेना से सीधी बस मिल जाए तो, इसके लिए आपको मुरेना बस स्टैंड पर घंटो खड़े रह कर लोहे के चने चबाने पड़ सकते हैं|  रेगिस्तान की बारिश की तरह अगर कोई राजस्थान परिवहन की बस आप पर तरस खा कर रुक जाए तो बाबा देवपुरी पर प्रसाद चढ़ाना मत भूलियेगा| ग्वालियर और धौलपुर के आलावा भारत के किसी भी अन्य शहर के लिए मुरेना से डायरेक्ट बस ढूंढना भूसे के ढेर में सुई ढूँढने के बराबर है|

एक मुरेनावासी होने के नाते आप खुद पर खीझ जायेंगे जब आपको पता चलेगा की धौलपुर जैसे छोटे जिले की कनेक्टिविटी मुरेना की तुलना मैं अच्छी है| मुरेना के सांसद केंद्र सरकार में मंत्री है इसके बाद भी सिटी हेडक्वार्टर से दिल्ली या भोपाल तक जाने वाली एक भी डायरेक्ट बस मुरेना मैं नहीं है|



आगरा मुंबई हाईवे पर होने के बाद भी मुरेना ट्रांसपोर्ट हब क्यूँ नहीं बन पाया?

उत्तर प्रदेश के छोटे छोटे कसबे और गाँव तक राजधानी लखनऊ से सीधी बस सेवाओ से कनेक्टेड हैं| यहाँ पर मैं खुले दिल से माननीय श्री नितिन गडकरी जी की नीतियों की सराहना करूँगा, पिछले दस सालो में युद्ध स्तर पर सडको और रिंग रोड का निर्माण हुआ और बहुत सारे रिमोट कसबे भी मुख्य धारा से जुड़ गए| आम आदमी उन जगहों के विकास का पैमाना वहां पर बढे हुए रियल एस्टेट के दामो से भी लगा सकते हैं| मगर मुरेना के साथ ऐसा नहीं हुआ है|  मुरेना के भूतपूर्व collecter श्री आर एस जुलानिया जी ने शहर के जिस हिस्से को दो दशक पहले अतिक्रमण से आज़ाद करवाया था, बस वही हिस्सा शहर जैसा नज़र आता है, पहले ये इलाका दुमंजिला हुआ उसके बाद तिमंजिला हुआ और आजकल यहाँ चौथी मंजिल की तैयारी चालू है|

इसके आलावा शहर के लिए कभी कोई प्लान शायद बनाया ही नही गया| मुरेना का बस स्टैंड इस शहर को अम्बाह , पोरसा और श्योंपुर जैसे शहरो का जंक्शन पॉइंट बनाता है| मगर ये जंक्शन पॉइंट आज भी देश के बड़े शहरो से डायरेक्ट बस सेवा के ज़रिये कनेक्टेड नहीं है|

सिर्फ इस बस स्टैंड की कनेक्टिविटी ठीक नहीं होने के कारण, अम्बाह, पोरसा और श्योंपुर के निवासी वही दर्द झेल रहे हैं जो बॉर्डर के पास स्थित सॅटॅलाइट शहर झेलते हैं| कनेक्टिविटी की ये कमी धीरे धीरे मुरेना को एक आर्थिक रेगिस्तान में तब्दील कर रही है जहाँ पैसा कमाने के लिए बस रेत की ट्रोलिया नज़र आती है|  


 

कोरोना के बाद की दुनिया के लिए कितना तैयार है मुरेना ?

कोरोना ने व्यवसाय के समीकरण बदल दिए है, अब बड़ी कम्पनीज और इंटरनेशनल ब्रांड्स छोटे शहरो में जगह बनाने की कोशिश कर रहे है| ऐसे में जब औधोगिक दृष्टिकोण से मुरेना का सर्वे किया जाता है तो कनेक्टिविटी का मुद्दा सबसे पहले निकल कर आता है| आज कोई बड़ी कंपनी मुरेना में इसलिए भी इन्वेस्ट नहीं करना चाहती क्यूंकि आगरा मुंबई हाईवे से सटे होने के बावजूद मुरेना बाकी देश से सीधी तरह कनेक्टेड नहीं है|

इकनोमिक वर्चस्व की लड़ाई में अब शहरो की verticle एक्सपेंशन की जगह चौतरफा विकास पर जोर दिया जा रहा है| धौलपुर जैसे शहरो में विकास का नक्शा देखिये आप समझ पायेंगे की ये शहर चारो तरफ बढ़ रहा है| मगर मुरेना के साथ ऐसा नहीं है, यही कारण है की मुरेना में औधोगिक विकास के कॉरिडोर या इंडस्ट्रियल साइट्स के बारे में सोचा ही नही जा सकता| कल जब बड़े उद्योग छोटे शहरो का रुख करेंगे तब उनके सर्वे शायद मुरेना को प्राइमरी स्टेज में ही रिजेक्ट कर देंगे|



सच तो ये है की आज एक बार फिर मुरेना शहर को श्री आर एस जुलानिया जैसे कलेक्टर की ज़रूरत है जिनके पास शहर के विकास का रोडमेंप हो| आज शहर को ज़रूरत है एक ऐसे प्रशासन की जहाँ कलेक्टर के नेतृत्व में पहले कनेक्टिविटी की समस्या सोल्व हो और उसके बाद शहर को चारो और बराबरी से विकसित किया जाए|

याद रखिये, २०२१ में इकनोमिक वर्चस्व की लड़ाई छोटे शहरो में लड़ी जायेगी, मगर इस बात का फायदा मुरेना जैसे शहर उठा पायेंगे या नहीं इस पर पूरी तरह संदेह किया जा सकता है| हमें ये समझना पड़ेगा की शहर में सरकारी ढांचों के निर्माण से विकास नहीं होगा, विकास के लिए ज़रूरी है एक रोडमेप, एक इंडस्ट्रियल मेप, जो आज ना तो प्रशासन के पास है और ना ही औधोगिक विकास में व्यस्त व्यापारी संगठनों के पास है|



 

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