किसान आन्दोलन, गांजा और क्राइम रिपोर्टिंग

 



भारत में चल रहे किसान आन्दोलन का हल ढूंढते समय कुछ लोगो ने एक लोकतांत्रिक तरीका समझाया है| उनके अनुसार भारत में जो राज्य ये कानून लागू करना चाहे वो कर सकते हैं और जो राज्य इसे नहीं अपनाना चाहते वो इसे नकार दे| रास्ता तो सही है मगर ये समस्या का अधूरा हल है| अगर इस समस्या का हल हमें ढूंढना तो हमें अमेरिका में चल रहे, क्राइम रिपोर्टिंग और गांजे के मॉडल को समझना पड़ेगा|

सबसे पहले क्राइम रिपोर्टिंग का सही मतलब समझिये, अमेरिका में थाने के अन्दर दर्ज होने वाले हर क्राइम को कंप्यूटर में फीड करके उस रिपोर्ट का डिटेल्ड एनालिसिस किया जाता है| साल के अंत में हर थाना, हर बीट, हर चौकी, हर ट्रैफिक सिग्नल अपने यहाँ दर्ज हुए क्राइम के पैटर्न पर आधारित एक रिसर्च रिपोर्ट बनाते हैं जिसे वहां पर काम कर रहे प्री क्राइम डिपार्टमेंट ( अपराध पूर्वानुमान विभाग) को सौंप दिया जाता है| अमेरिका में तो यहाँ तक है की वहां पहले राज्य आपस में अपने नोट्स का मिलान करते हैं और इसके आधार पर अगले साल पुलिस की पोस्टिंग, रिपोर्टिंग, गश्त के टाइम schedule वगैरा बनाये जाते हैं| यहाँ क्राइम रिपोर्टिंग की सबसे बड़ी खासियत ये है की इन रिजल्ट्स के आधार पर अमेरिका के राज्य अपनी  अपराध नीतियों में परिवर्तन करते हैं|



गांजे के बूटा, बॉलीवुड का चैन लूटा, अमेरिका का लाडला बेटा

पिछले दस सालो से अमेरिका में गांजा या मारिजुआना क्रांति आई हुई है| जी हाँ ये वही गांजा है जिसकी वजह से भारती सिंह के यहाँ लोग सुबह सुबह आ धमकते हैं, ये वही गांजा है, जिसका झूठ मूठ नाम लेकर दीपिका पदुकोने शेखी बघारती हैं, ये वही गांजा है जिसकी वजह से रिहा चक्रवती ने एन सी बी के viva exam के लिए ड्रग एंड नारकोटिक्स एक्ट की पूरी पढाई कर डाली| ये वही गांजा है जिसकी तुलना दीपिका पादुकोने रणवीर सिंह से करती है|



अक्षय कुमार आपको कभी ये बात नहीं बताते की गांजे का बूटा और उसकी फॅमिली के बाकी ड्रग्स अमेरिका में ड्रग लाइसेंस देकर बेचे जाए या नहीं, इस पर वहां के राज्यों में आपसी विवाद है| अमेरिका के बहुत सारे राज्य मानते हैं की गांजा और cannible फॅमिली के बाकी ड्रग्स सही मात्रा में लिए जाए तो सिर्फ फायदेमंद है| दूसरी तरफ अमेरिका में ही बहुत सारे राज्य इन्हें कॉण्ट्राबेंड प्लांट्स भी मानते हैं| 



कुछ राज्य इसे उगाने की और व्यापक पैमाने पर उगाने की अनुमति देते हैं तो कुछ राज्य गांजे की smuggling को लेकर भी चिंतित है, उन्हें लगता है की गांजे की खेती की वजह से उनके राज्य में लगाये गए प्रतिबन्ध की धज्जिया उड़ जायेगी|  इसके अलावा सारे राज्य साथ बैठ कर तुलनात्मक अध्ययन भी करते हैं| मसलन जिन राज्यों में गांजा बेचना लीगल है वहां क्राइम रेट ज्यादा है या फिर उन राज्यों में जहाँ गांजा गैरकानूनी है| इसके अलावा गांजे को लेकर कितने क्राइम होते हैं, ये भी एक विषय होता है|


कल्पना कीजिये की कुछ राज्यों में कृषि क़ानून लागू हो और कुछ राज्यों को छोड़ दिया जाए तब

अगर भारत में कृषि कानूनों को कुछ राज्यों में लागू कर दिया जाए और बाकी राज्य इसे छोड़ दे तो फिर एक दिलचस्प तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है| हर साल इस बात का आंकलन हो सकता है किन राज्यों में किसानो की आय बढ़ी है और किन राज्यों में अभी सुधार की गुंजाइश है| इस तरह की कोई भी व्यवस्था फौरी तौर पर एक बड़े ही ज़रूरी सवाल का जवाब दे सकती है| ये सवाल मीडिया ने उठाया था जब उन्होंने कहा था की कृषि कानूनों को लेकर हो रहा आन्दोलन सिर्फ कुछ राज्यों तक ही सीमित है| यदि ऐसा है तो फिर जो राज्य कृषि कानूनों का पालन नहीं करेगे वहां अपने आप विद्रोह के स्वर उभरने लगेगे, या फिर इसका उल्टा भी हो सकता है, जिन राज्यों में क़ानून लागू हूगा वहां बगावत हो जायेगी| कृषि कानूनों का विकेंद्रीकरन केंद्र और राज्य सरकारों को इस क़ानून के बारीक पहलुओ और प्रैक्टिकल परेशानियों को समझने में भी मदद करेगा|



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