सच्ची खबर नहीं राजनेतिक दलों की तरफ है झुकाव, सबूत खुद देखिये जनाब

 

भारत में एक नयी तरह की मीडिया रिपोर्टिंग के प्रणेता श्री सुधीर चौधरी जी को सादर नमन करते हुए, उन्ही के अंदाज़ में दो खबरों के प्रस्तुतिकरण का आंकलन करेंगे और फिर आप राजनेतिक दलों और मीडिया चेनल के इस चोली दामन वाले साथ के बारे में ठन्डे दिमाग से सोचियेगा|



जी न्यूज़ की खबर उत्तर प्रदेश के मुरादनगर से

मुरादनगर में शमशान की छत गिरने के बाद जी न्यूज़ ने एक शिकायत का हवाला दिया जिस में शिकायतकर्ता ने एक बटा दस के अनुपात मैं सीमेंट और बालू के इस्तेमाल की बात की गयी| ये पत्र शहर के तीन आला अधिकारियो को भी संबोधित किया गया था| इसी न्यूज़ पीस में शिकायतकर्ता की साउंड बाइट दिखाई गयी, उसके बाद नगर निगम की कार्यप्रणाली को कोसा गया| कड़ी से कड़ी सजा देने की दुहाई दी गयी| मगर इस रिपोर्ट को कवर करते वक्त एक ज़रूरी एंगल को आपसे छिपा लिया गया, वो ज़रूरी एंगल ये था की जो निर्माण कार्य सिर्फ बारह लाख में पूरा हो सकता था उसे पूरा करने के लिए पचास लाख रूपये से ज्यादा सेंक्शन क्यूँ किये गए|

इस बारे में शब्दों और डिप्लोमेसी रस के प्रचुर धनी, श्री रजत शर्मा जी की रिपोर्टिंग और भी ख़ास है, उन्होंने अपनी प्राइम टाइम बुलेटिन में कहा की अगर योगी सरकार शमशान की छत बनाने के लिए पचास लाख रूपये दे रही है तो इस से उनकी अच्छी नीयत का पता चलता है|



एक श्रोता, दर्शक, नागरिक होने के नाते आपको नहीं लगता की इन दोनों चैनल्स को जन प्रतिनिधियों को भी घेरना चाहिए था| आपको नहीं लगता, इन दोनों चैनल्स को दो बहुत ज़रूरी सवाल और भी उठाने चाहिए थे| पहला सवाल ये की “ आखिर पब्लिक मनी का बंदरवाट हो किस तरह रहा है| स्थानीय नेताओ और जनप्रतिनिधियों की इसमें कितनी भागीदारी है|

दिखावे के ऊपर दिमाग लगाइए “वर्शन ऑफ़ ट्रुथ” नहीं “ absolute ट्रुथ” की तलाश कीजिये

मसलन मुराद नगर के मामले में तय कीमत से पांच गुना ज्यादा  पैसा सेंक्शन हुआ, तीस प्रतिशत का भोग नगर निगम को लगा बीस प्रतिशत कमाने का हक मर्केंटाइल लॉ के हिसाब से ठेकेदार को भी है| निर्माण कार्य में कुल स्वीक्रत हुई लागत का सिर्फ दस प्रतिशत लगना था, इसके बाद चालीस प्रतिशत की राशि  यानी तीस लाख अभी भी बाकी है| इस चालीस प्रतिशत का भोग किन लोगो को लगा है इसका पता ठेकेदार के खातो को ऑडिट करके बड़े आराम से लगाया जा सकता है| क्या योगी सरकार ऐसा कोई ऑडिट करवाएगी, क्या इस डील का पोस्टमार्टम करके निकाय स्तर के वो चेहरे ढूंढें जायेगे जिन्होंने “करप्शन के इस इंस्ट्रूमेंट” की  रचना की है|



क्या जी न्यूज़ या कोई भी और चैनल इस मनी ट्रेल में रूचि दिखायेगा| खैर ये, उनकी चॉइस है, हम उनकी अभिवयक्ति की स्वतंत्रता की पूरी इज्ज़त करते है| साथ ही हम दर्शको और पाठको से अनुरोध करते है की “कम्पलीट वर्शन ऑफ़ ट्रुथ” के  लिए मीडिया पर भी उसी तरह दबाब बनाए जिस तरह सरकार और जन प्रतिनिधियों बार बनाया जाता है|

क्रन्तिकारी अर्नब की जोशीली रिपोर्ट का होशमंद एनालिसिस

जी न्यूज़ के इस उदाहरण का एनालिसिस करने के बाद ये राय मत बनाइये की चेनल सरकार को डायरेक्टली टारगेट नहीं करते है| बिलकुल करते हैं, शब्दों के युवा क्रन्तिकारी, आत्महत्या, और abetment to suicide मामलो में रिपोर्टिंग के विशेषज्ञ श्री अर्नब गोस्वामी के चैनल रिपब्लिक ने  महाराष्ट्र के भंडारा में हुए अग्निकांड को कवर करते हुए २०१८ में दायर हुई एक आर टी आई का उल्लेख किया| इस आर टी आई में जवाब आया था की वो हस्पताल सुरक्षा मानको के हिसाब से under-staffed है|



जैसा की आप उम्मीद रख सकते हैं, लापरवाही और ओवरसाईट का ठीकरा सीधे सीधे “सुनो उद्वव ठाकरे” के लहजे में शिवसेना और कांग्रेस की सरकार पर फोड़ दिया गया| मगर अर्नब जी के जोशीले सैनिक, ये आंकलन करना भूल गए की आर टी आई सन 2018 में लगाईं गयी थी, अगर आर टी आई की प्रोसेसिंग के मद्देनज़र इसमें से पांच महीने और कम किये जाये तो पता चलता है की ये कमी सन २०१७ में भी थी| जो हादसा २०२१ में हुआ है वो २०१७ या २०१८ में भी हो सकता था| आपको नहीं लगता की जानलेवा शब्दों के हथियार से लेस अर्नब और साथियो को इस मामले में “सुनो उद्वव ठाकरे” के साथ “ सुनो देवेन्द्र फड़नवीस” का राग अलापते हुए पूरी राजनेतिक कम्युनिटी पर हमला बोलना चाहिए था|  



कहीं उग्रता और चीख चिल्लाहट है, कही पर तथ्यों का अधूरा एनालिसिस है, मगर वो खबर कहाँ है जो सोच को बदल सके| दरअसल अच्छी सोच को चाहिए वो शौचालय जहाँ सार सार गहि के रखा जा सके और कुपच करने वाली आधी पकी खबरों को जागरूकता के ड्रेनेज में बहा दिया जाए|



 

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