शराब माफिया नहीं “कारोबारी इको सिस्टम” ज़िम्मेदार है मुरैना ज़हरीली शराब हादसे के लिए


 

मुरैना के बाद ज़हरीली शराब का दानव अपने अगले शिकार दतिया में भी ढूंढ सकता है| एक जागरूक पत्रकार होने के नाते मैं दतिया के आबकारी विभाग को भी चेताना चाहूँगा की दतिया की गलियों में भी शराब की होम डिलीवरी कम रेटस पर चालू है| दतिया शहर के जो गाँव उत्तर प्रदेश की सीमा से टकराते हैं वहां भी आपको मुरैना जैसी  नकली ब्रांडेड शराब बेच रही गुमटिया मिल सकती है| दतिया ही क्यूँ, मध्य प्रदेश का हर वो हिस्सा जो राजस्थान या उत्तर प्रदेश से जुड़ता है वो हर दिन इस तरह के किसी हादसे के होने का इंतज़ार कर रहा है| मुरैना हादसे में जिस तरह से नकली शराब रैकेट के साथ पुलिस की भागीदारी सामने आई है उस वजह से बहुत सारे लोग आगे बढ़ कर रिपोर्ट करवाने में डर रहे हैं| “पुलिस” और “शराब तस्करों” का ये “हैण्ड इन ग्लोव” अरेंजमेंट बड़े या छोटे स्तर पर नज़र आ ही जाता है क्यूंकि राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच शराब के दामो में भारी अंतर है और इस धंधे में मुनाफे का स्कोप बहुत ज्यादा है|

दतिया और मुरैना कैसे बन जाते हैं एक कारोबारी इको-सिस्टम का हिस्सा

दतिया का नाम विशेष रूप से लेने के पीछे एक कारण ये भी है की दतिया और झांसी का बॉर्डर मिला हुआ है| एक चेक पोस्ट, पांच किलोमीटर की दूरी और शराब के दामो में सीधे सीधे दुगुने का अंतर, इतना काफी है टैक्स चोरो के लिए | बड़े आराम से कारोबारी एक eco system बन जाता है जहाँ हर स्तर पर बीस टके का सीधा मुनाफा होता है| वो भी कोई बड़ी  रकम फंसाए बिना| शहर, गाँव, चेक पोस्ट, और मरने वालो के नाम बदलते हैं, मगर कहानी पुरानी ही रहती है|



 होता ये है की पहले अंतर-प्रांतीय शराब तस्कर एक नेटवर्क बनाते है जो सरकारी ठेकों के समानांतर एक ब्लैक मार्किट क्रिएट करता है जहाँ टैक्स चोरी के दम पर सस्ती की गयी शराब बिकती है| सस्ती शराब की डिमांड बढ़ना शुरू होती है, गली कूचो में स्लीपर एजेंट्स नियुक्त किये जाते हैं| कारोबारी eco-system का दायरा और भी बढ़ता है जब इन स्लीपर एजेंट्स का कारोबार बढ़ना शुरू होता है| जब समानांतर मार्किट में बिक्री का वॉल्यूम एक स्तर पार कर जाता है तब एंट्री लेती है मिलावटखोर लोगो की टोली| ये लोग पहले से सस्ती शराब को और भी सस्ता बनाने के लिए बॉटलिंग प्लांट लगाते है और फिर कच्ची शराब या फिर इंडस्ट्रियल अल्कोहल की मिलावट करके counterfeit bottles यानी बड़े ब्रांड की नकली बोतल मार्किट में बेचना शुरु करते हैं| इस तरह से एक पूरा बिजनिस नेटवर्क बन जाता है, बाद में आबकारी विभाग के कुछ अधिकारी मिल कर छोटे छोटे eco-system बना लेते हैं जहाँ ये व्यापार आराम से फलता फूलता है|

 


आज  दतिया की गलियों में शराब का जो होम डिलीवरी कारोबार चल रहा है वो किसी ओपन सीक्रेट की तरह है| यानी पता आपको सब कुछ है मगर सबूत आपके पास कोई नहीं है| मुझे उम्मीद है की दतिया का प्रशासन मुरैना के प्रशासन की तरह ज़हरीली और नकली शराब का व्यापार साबित करने के लिए बारह शवो के पोस्टमार्टम का इंतज़ार नहीं करेगा|

आखिर शराब जी एस टी के दायरे में क्यूँ नहीं आ सकती, शराब के लिए बिल देना compulsory क्यूँ नहीं है|

कर सरलीकरण की प्रक्रिया के दौरान आखिर शराब को जी एस टी के दायरे से बाहर क्यूँ छोड़ दिया गया?  इस  प्रश्न का उत्तर कोई भी सरकार देने को तैयार नहीं है| मुरैना में हुई मौतों के  आबकारी विभाग या पुलिस विभाग के साथ साथ मध्य प्रदेश सरकार की शराब नीति को भी उतना ही दोषी माना जाना चाहिए| मोदी जी ने  “वन नेशन, वन टैक्सेशन” का जो सपना देखा है, मध्य प्रदेश की शराब नीति उस नोबल विचारधारा पर गहरी चोट करती है| मिलावट और कर-चोरी के बिजनिस मॉडल के दम पर फल फूल रहे इस कारोबारी eco-system को छोटी मछलिया पकड़ कर खत्म नहीं किया जा सकता| गृहमंत्री श्री नरोत्तम मिश्रा जी और मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान जी को इसके लिए सर्जिकल स्ट्राइक वाला “ मोदी-मंत्र” अपनाना पड़ेगा|

जिस तरह मोदी जी और स्वर्गीय जेटली जी ने करो का सरलीकरण करके टैक्स चोरी को रोका है, उसी तरह शराब के दामो को उत्तर प्रदेश और राजस्थान के समकक्ष लाकर मध्य प्रदेश में ज़हरीली और मिलावटी शराब के इस कारोबार को हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है|

इसके अलावा ठेकों पर डिजिटल बिल देने की व्यवस्था भी की जा सकती है, सरकार शराब के निर्माताओ से अच्छी पैकेजिंग की अपील कर सकती है| बहुत कुछ किया जा सकता है बशर्ते की मध्य प्रदेश के राजनेतिक तबके में मोदी जी जैसी इच्छाशक्ति हो|



Post a Comment

Previous Post Next Post