किसान कौनसे साबुन से नहाते हैं, कौनसी चक्की का आटा खाते हैं ?

 

रिपब्लिक टीवी रिपोर्टर को अत्याधुनिक टेंट नज़र आये मगर पचपन लाशें उठी उनकी खबर नहीं है| इंडिया टीवी और रजत शर्मा जी को डर है की कहीं किसान दिल्ली में छब्बीस जनवरी को ट्रम्प कार्ड ना चल दें| सुधीर चौधरी जी राहुल गाँधी जी के हॉलिडे का डी एन ए एनालिसिस करने मैं बिजी है | इन सब से दूर दिलेर, जिंदादिल किसान अब धरना स्थल पर ही लोहड़ी मनाने की तैयारी कर रहे हैं| आज भारत के सारे समाचार पत्र किसानो और कृषि मंत्री के बीच हुई तल्ख़ बातचीत के पोडकास्ट  से रंगे हुए हैं| अगर ऐसा ही रहा तो कहीं “जय जवान जय किसान” के बाद “ जीतेंगे या मरेंगे” कहीं अगला नारा ना बन जाए|

दिलेर किसान भी जिद पर अड़ा है, या तो सब कुछ चाहिए, या कुछ भी नहीं

जिस बारीकी से पोपुलर मीडिया किसान आन्दोलन की डिटेल्स को कवर कर के सरकार को हीरो और किसानो को विलन बनाने पर आमादा है, कुछ दिनों में आप ये रिपोर्ट भी देख पायेंगे की किसान कौनसे साबुन से नहाते हैं नाश्ते में कौनसी कॉर्न फ्लेक्स खाते हैं, इनके पीछे चीन की फंडिंग है या फिर इन पर पाकिस्तान/खालिस्तान  का मार्का लगा हुआ है| पिछले दिनों  सम्मानीय सुप्रीम कोर्ट ने किसान आन्दोलन में covid गाइडलाइन्स को लेकर चिंता जताई| दरअसल सच तो ये है की किसान आन्दोलन जैसा पारदर्शक आन्दोलन भारत के इतिहास में हुआ ही नहीं है, इंडिया टीवी, रिपब्लिक टीवी और ज़ी न्यूज़ जैसे कई चैनल, कैमरे नहीं माइक्रोस्कोप लेकर इस आन्दोलन के हर पहलू की एडवांस्ड फॉरेंसिक जांच में दिन रात व्यस्त हैं|



बड़ी बारीकी से किसान खेमो को स्टडी करने के बाद पिछले दिनों कुछ चैनल्स ने दावा किया की किसान आन्दोलन सिर्फ उन्ही राज्यों में मुखर हुआ है जहाँ कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों का शासन है| किसान संगठनों में फूट की बड़ी बड़ी खबरे सामने आई| पूस की  माइनस डिग्री टेम्परेचर वाली रात में खुले आसमान में बैठे लोग किसान नहीं आढतिये हैं इस विषय पर भी खोजी पत्रकारिता हुई, लोगो के चेहरों पर "नकली किसान" के स्टाम्प लगाकर दिखाए गए| इस रिपोर्टिंग की पराकाष्ठा तब सामने आई जब रजत शर्मा जी जैसे गवर्नमेंट मान्य पत्रकार ने ट्रम्प समर्थको की कार्यवाही को किसान आन्दोलन के तरीको से को-रिलेट कर डाला|



ट्रम्प समर्थको के विद्रोह ने एक स्तर पर अमेरिका के लोकतंत्र को मज़बूत भी किया है

वरिष्ठ पत्रकार श्री रजत शर्मा जी ने ट्रम्प समर्थको के साथ किसान आन्दोलन की तुलना करके जो नयी फाइल बनाई है उस पर कुछ पंक्तिया में भी लिखना चाहता हूँ| रजत शर्मा जी ने चिंता जताई की भारत का विपक्ष कहीं desperate होकर ट्रम्प समर्थको जैसा व्यवहार ना करने लगे| उनके अनुसार किसान आन्दोलन में भी विपक्ष की मोदी के खिलाफ एकजुटता और हठधर्मिता नज़र आती है|

 इसी विचार के अंतर्गत में  रजत जी की जानकारी मैं दो और तथ्य लाना चाहता हूँ| पहला तथ्य उस सर्वे के बारे में है जो कहता है की बयालीस प्रतिशत रिपब्लिकन  वोटर्स ट्रम्प समर्थको के साथ है| दो सौ बत्तीस रिपब्लिकन representatives मैं से सौ लोगो ने ट्रम्प के इस एक्ट में बारे कुछ नहीं कहा है| इस तथ्य को समझना इसलिए ज़रूरी है क्यूंकि पिछले कुछ सालो से अमेरिका द्विदलीय राजनीती से परेशान हैं| वहां भी चुनाव लड़ते समय “विकल्प” और “ चॉइस” जैसे शब्द इस्तेमाल किये जाते हैं| मगर मतदाताओ के सामने तीसरी चॉइस है ही नहीं| ये एक तरह की पोलिटिकल म्यूजिकल चेयर है जहाँ बैठने वाला बदलता है, बाकी सब वही का वही रहता है और अमेरिकन राष्ट्रवाद की पैकेजिंग में छिप कर जायज़ हो जाता है|



 अगर ट्रम्प वहां एक तीसरा मोर्चा खड़ा करने में कामयाब हो जाते हैं, अगर वहां तीसरे धड़े को वोट की शक्ल में मान्यता मिल जाती है तो यकीन कीजिये ये अमेरिका के लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा संकेत है|



क्यूँ ना सडक पर ही समाधान ढूंढ लिया जाए  

  

वैसे पिछले दिनों किसान आन्दोलन मैं एक सकारात्मक पहल भी हुई है, कुछ न्यूज़ चैनल कह रहे हैं की सरकार ने किसानो को प्रस्ताव भेजा है की जो राज्य इस क़ानून को लागू नहीं करना चाहे वो इसे नकार भी सकते हैं|

ख्याल बुरा नहीं है...

ये मेरी व्यक्तिगत राय है की किसान अगर इस बात पर राज़ी हो जाते है तो कई समस्याए सोल्व हो सकती है| सबसे पहले तो इस बात का आंकलन हो जाएगा की किसान आन्दोलन सिर्फ कांग्रेस और लेफ्ट प्रायोजित आन्दोलन है या फिर ये जनमानस की भावनाओ का प्रतीक है| दूसरी बात ये की एक साल बाद तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है| जिस तरह लगातार सुधार करके इस देश में जी एस टी को लागू किया गया है उसी तरह किसान क़ानून के भी नए ड्राफ्ट लाये जा सकते हैं और कृषि सुधारो की दिशा मैं कुछ सर्व सम्मत कदम उठाये जा सकते हैं|



 

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