किसान राजनीति के राजा बाबू टिकैत की फिल्म फिर से हिट हो चली

 


आदरणीय राकेश टिकैत को राजनीति का राजा बाबू की पदवी दी है, डी एन ए अनुसंधानी श्री सुधीर चौधरी जी ने| जी न्यूज़ पर अपने शो में टिकैत के आंसुओं की दास्तान और देशभक्ति के गान सुनाते वक्त उन्होंने टिकैत जी की तुलना सन १९९४ में आई फिल्म राजा बाबू के किरदार से की थी| इस तुलनात्मक अध्ययन के समय वो ये बताना नहीं भूले की राकेश टिकैत ने अपने जीवन में दो राजनेतिक चुनाव लडे और दोनों ही बार वो दस हज़ार से ज्यादा वोट अपनी झोली में नहीं डाल पाए| दो दिन पहले जब गाज़ीपुर बॉर्डर पर किसान आन्दोलन की गलिया सूनी थी उस समय सुधीर चौधरी जी उन्हें एक प्रायोजित आन्दोलन का चेहरा साबित करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी थी| साथ ही कहा था की ये हारे हुए नेता इस मंच पर भी हार का सामना करेंगे|



 

 परसों रात राकेश टिकैत के आंसुओ का हर कोई मजाक उड़ा रहा था, मेरठ का पानी पीने की उनकी इच्छा को लेकर सोशल मीडिया पर कई मेमे भी चलाये गए| आंसुओं से भीगे उनके चेहरे को योगी आदित्यनाथ की कडक पुलिस और उनके टार्चर के तरीके से जोड़ा गया| मगर उस वक्त किसी को अंदाज़ भी नहीं होगा की सोशल मीडिया पर उड़ाया गया ये मजाक और सुधीर चौधरी जैसे खबरनवीसो द्वारा दिखाई गई रिपोर्ट्स दरअसल उल्टा असर कर देंगी| सिर्फ चौबीस घंटे के अन्दर गाज़ीपुर मैं माहौल बदल चुका है| टिकैत के आंसुओं का असर देखिये, कल तक जो मीडिया इस आन्दोलन को सिर्फ पंजाब का आन्दोलन कह रही थी, उसे अब आन्दोलन में उत्तर प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की साफ़ साफ़ भागीदारी नज़र आने लगी है|




अगर सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग पोस्ट्स पर नज़र डाली जाए तो दो और बाते समझ आती है, पहली बात ये की गणतंत्र दिवस पर हुई घटनाओ को लेकर लोगो में गुस्सा बहुत है और हर कोई चाहता है की दोषियों को इतनी कड़ी सजा मिले जो मिसाल बन जाए| दूसरी बात ये है की पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अब ये जनता की आपसी लड़ाई भी बन रहा है जिसकी पहुँच अब गलियों और चौराहों पर नज़र आ रही है| अगर एक समाज शास्त्री के नजरिये से देखा जाए तो ये लड़ाई शहर बनाम गाँव, या फिर अमीर बनाम गरीब का चोला भी पहन सकती है| इसका एक मायना ये भी निकाला जा सकता है की अगले साल होने वाले पंचायत चुनावों और उसके बाद विधान सभा चुनावो में वोटर्स का motivating फैक्टर और रुझान दोनों बदल सकते हैं|



अब सारा दारोमदार टिक जाता है, दीप सिध्दू के स्टैंड पर,  दीप सिद्धू ने हाल ही में बयान दिया की वो इस किसान आन्दोलन के नेताओ की पोल पट्टी खोल देगा और ये साबित भी कर देगा की  गणतंत्र दिवस पर हुई शर्मनाक घटना उसने किसके इशारे पर अंजाम दी| इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता की गणतंत्र दिवस पर लाल किले में जो हुआ वो किसानो के संख्या बल की वजह से हुआ| अगर इतनी तादाद में किसान वहां नहीं पहुँचते तो शायद सुरक्षा बल सिद्दू और उनके साथियो को काबू में कर भी लेते| फिलहाल सोशल मीडिया और मेन-स्ट्रीम मीडिया में दो तरह के नैरेटिव चल रहे हैं, पहले नैरेटिव के हिसाब से किसान आन्दोलन के नेताओ के इशारे पर सिध्दू और उसके साथियो ने लाल किले का कांड अंजाम दिया, दूसरा नैरेटिव कहता है की बीजे पी और सरकारी तंत्र ने मिलजुल कर वो eco-system तैयार किया जहाँ सिद्धू ने ना सिर्फ लाल किले पर वो कांड अंजाम दिया बल्कि, पूरा दोष आन्दोलन के सर मढ़ दिया|



मतलब ये उम्मीद की जा सकती है आने वाले समय में किसान आन्दोलन में अगला ट्विस्ट उस दिन आएगा जिस दिन दीप सिध्दू बेडियो में बंधा अदालत में खड़ा होगा और अपने साथियो के नाम सबको बतायेगा| अब इस आन्दोलन में राजनीती ने ऑफिशियली कदम रख लिया है और दिल्ली के बॉर्डर की लपटें अब धीरे धीरे बाकी शहरो में बढ़ चली है| बी जे पी बनाम विपक्ष के बाद ये आन्दोलन किसान बनाम देशभक्त और गाँव बनाम शहर जैसे खतरनाक मोड़ भी ले सकता है|

 

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