ट्रेक्टर पर उड़ता किसान, खाई में गिरता जवान, मेरा भारत महान


 

दिल और दिमाग भी कंप्यूटर हो गए हैं, सोच गूगल की तरह चलती है, और कलम अब लिखने से पहले "की वर्ड" पूछती है| तो पहले आपको चार की वर्ड्स के से परिचित करवा दूँ|

लाल किला : 26 जनवरी को फिर से लुट गई दिल्ली, इस बार निशाने पर था लाल फोर्ट, सबसे ह्रदय विदारक दृश्य वो था जब, दुश्मनों को रोकने के लिए बनाई गयी खाई में भारतीय गणतंत्र द्वारा दी गयी वर्दी पहले पुलिस के जवान इस तरह गिर रहे थे जैसे किसान कोल्ड स्टोरेज में आलू और खलिहान में भुस की बोरिया फेंकते हैं|

लाल सलाम : सन 1917 में ज़ार ( रूस से निरंकुश शासक जिनकी तुलना चाणक्य के मगध से की जा सकती है) के खिलाफ क्रांति करते वक्त, कम्युनिस्ट सेनाओ के पास जवान ज्यादा थे बंदूके कम थी, इसलिए हर छह आदमियों के बीच एक बन्दूक दी गयी और कहा गया की इस टुकड़ी के आखिरी आदमी को बन्दूक छोड़ने से पहले कम से कम एक सैनिक को मारना ज़रूरी है|

लाल फीताशाही : अंग्रेजो के ज़माने से चला रहा पुलिस एक्ट एक किस्म की लाल फीताशाही को प्रमोट करता है जहाँ पर आम आदमी के  इंटरेस्ट इसलिए compromise होते है क्यूंकि पुलिस के पास ऐसे बहुत से हथकंडे हैं जिनकी मदद से वो सच को दबा सकते हैं और कई बार निर्दोष को ही क़ानून के मकडजाल में फंसा सकते हैं| सन 2001 में अमेरिका ने अपने पुलिस एक्ट में सुधार किया और Exclusionary Act लाकर आम आदमी के अधिकार बढ़ाये

पुलिस रिफार्म : ये दरअसल कोई की वर्ड नहीं है, ये तो एक प्रोजेक्ट है जो पिछले एक साल से दिन रात मेरे दिल मैं धडक रहा है| पिछले एक साल में बड़ी बारीकी से स्टडी  किया है मैंने| लाल किले की खाई में भुस के बोरो की तरह गिरते पुलिस वालो को गणतंत्र दिवस के दिन गिरते हुए बस एक ही ख्याल आया, क्यूँ ना एक  mass encounter” कर दिया जाए जैसा की हिटलर के ज़माने में होता था| आठ दस पगड़ी वाले पागल कुत्तो की भीड़ डंडे और लाठी लेकर पुलिस के जवान को ऐसे मार रही थी जैसे गीदडो का झुण्ड घायल शेर का मांस नोचने की कोशिश कर रहा हो|



गणतंत्र दिवस के दिन गणवेश और गणमान्य का अपमान

पुलिस की खाकी वर्दी को अगर संविधान प्रदत्त गणवेश के तौर पर देखा जाए तो समझ आता है की पुलिस दरअसल, गण यानी जनता द्वारा परोक्ष या अपरोक्ष रूप से चुने गए प्रतिनिधि है, जनता और संविधान की रक्षा के लिए उन्हें “License to Kill” भी दिया जाता है| जिस तरह दिल्ली में किसान आन्दोलन के लोगो की भीड़ ने पुलिस पर हमला किया था, पुलिस के पास पूरे कारण थे की वो बंदूके तानती और अपनी “power to enforce a deterrence” का इस्तेमाल करते हुए फायरिंग कर देती तो लाल किला तो छोड़ दीजिये, दिल्ली में लाल भाई पचौरी की दुकान के सामने पड़े पत्ते, दोने और प्लास्टिक तक खुद ब खुद कूड़ेदान और पतली गलियों की शरण ले लेते|

 ट्रेक्टर पर बैठ कर “ Tomorrow Never Dies” के जेम्स बांड बने हुए ये किसान आन्दोलन के गुंडे, अगर एक बार दंगा नियंत्रण वाहन वज्र को रौद्र रूप में दूर से ही आता हुआ देख लेते तो उनके  पीछे की तरफ से सैकड़ो लाल सलाम बिगुल की धुन बजाते हुए एक साथ निकल जाते| 

आन्दोलन भक्ति नहीं दारू का नशा चढ़ा था  अन्नदाता के प्रतिनिधियों पर

 जो पुलिस कर्मी कल चोटिल हुए हैं उन्होंने बयान दिए हैं की कई आन्दोलनकारी शराब के नशे में धुत थे| जो लोग लाल किले की छत पर खड़े होकर आदमकद तलवारे लेकर फरसे के करतब दिखा रहे थे उनके नृत्य में भी शराब की लहरिया थिरक रही थी| जो ट्रेक्टर चालक ट्रेक्टर को डायनासोर और पुलिस को कीड़ा मकोड़ा समझ कर दौड़ रहे थे वो भी अनुराग कश्यप की फिल्म “उड़ता पंजाब” के सीन याद दिला रहे थे|



लाल किला, लाल फीताशाही, लाल सलाम और पुलिस रिफार्म

आई टी ओ पर बेरिकेटिंग गिरा रहे एक ट्रेक्टर पर लाल सलाम का झंडा लगा हुआ था| कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास और बीसवी शताब्दी की शुरुआत मज़लूमो के लिए उनके संघर्ष को सलाम करते हुए आज में उनसे अपील करता हूँ वो किसान आन्दोलन के नाम पर उनकी छवि को धूमिल कर रहे इन गुंडों को खुद ढूंढ कर पुलिस के हवाले करें, अगर वो ऐसा नहीं कर सकते और आरोप प्रत्यारोप की राजनीति में उलझते हैं तो फिर जनता मान लेगी की उनकी रगों में सन 1917 की क्रांति का रक्त नहीं दौड़ रहा है, बल्कि वो भी चीन की तरह भारत में ओरिएण्टल एक्सप्रेस चलाने के सपना देख रहे हैं| जिस ट्रेक्टर पर लाल सलाम का झंडा हो वो एंटी-एस्टाब्लिश्मेंट हरकत कर ही नहीं सकता, ये कम्युनिस्ट पार्टी के लीडर्स की ज़िम्मेदारी हो जाती है की वो इन गन्दी मछलियों को खुद ढूंढ कर  पुलिस के हवाले करें|



चैंपियन ऑफ़ फ्रीडम एंड जस्टिस वाली पुलिस चाहिए, फेयर प्ले ट्राफी जीतने वाली पुलिस नहीं  

पिछले साल हमने दिल्ली पुलिस को अपनी बेबसी पर आंसू बहाते हुए देखा था, आज ये फ़ोर्स, श्री अमित शाह जी की सरपरस्ती मैं है| प्रति व्यक्ति पुलिस घनत्व के आधार पर दिल्ली भारत के टॉप पांच शहरो में गिना जाता है| हम अपील करते की आज दिल्ली पुलिस को पहले से ज्यादा ताक़त दी जाए| इक्कीसवी सदी के भारत में पुलिस रिफार्म दो स्तरों पर लागू हो| पहला CRPC का सरलीकरण हो ताकि आम आदमी को पुलिस के सामने जाने से डर ना लगे और दूसरा, पुलिस को भी सशक्त बनाया जाए | लाल किले पर फरसे के करतब दिखाते धर्म विशेष के लोगो को देखकर मेरा अंतर्मन काँप जाता है| हमारा पोलिटिकल सिस्टम बेहद कमज़ोर हो चला है| याद रखिये, कल शराब के नशे में धुत कोई अतिवादी आपके घर की छत पर भी ऐसे मज़हब के नाम पर फरसों का करतब दिखा सकता है, उस वक्त अगर आपके शहर की पुलिस लाल किले वाली घटना की तरह की फेयर ट्राफी जीत कर चली गई तो आप कहीं के नहीं रहेंगे|

 


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