हाय आबकारी कुनीति, महँगी सस्ती के चक्कर मैं जनता ज़हरीली शराब है पीती

 


मरने वालो का आंकड़ा बीस के पार हो चुका है| मुरैना के जिस गाँव में ज़हरीली शराब बेचीं गयी वहां के लोगो ने कहा है की वहां का एक परिवार इसी काम में सालो से लिप्त था| “फोर सीजन ऑफ़ अ वेंडर” की तर्ज़ पर वो लोग कभी छिप के कभी खुल के अपने इस पारिवारिक व्यापार को चला रहे थे|

बहरहाल फौरी तौर मीडिया को ब्रेकिंग न्यूज़ देने के लिए और उनके “खबर का असर” सेगमेंट को मसाले से लबरेज़ करने के लिए जिला मुरैना के कलेक्टर को लूप लाइन में लगा दिया गया है|  किस्तों में और भी अधिकारियो पर भी गाज़ गिर सकती है| गौर तलब बात ये है की कलेक्टर साहब को मुरैना का चार्ज संभाले हुए अभी कुछ हफ्ते ही हुए थे|





मुरैना जैसी घटनाऐ तब तक नहीं रुकेगी जब तक मध्य प्रदेश सरकार अपनी आबकारी नीति को व्यवहारिक और मार्किट फ्रेंडली नहीं बनाएगी| मध्य प्रदेश में शराब पर लगने वाला कर, अनायास ही लाइसेंसराज के दिनों की याद दिलाता है| आज जब देश के प्रधानमंत्री मोदी जी देश में कर व्यवस्था को दुरुस्त करके perfect competition market के पक्ष में हैं, मध्य प्रदेश की आबकारी नीति उनके प्रयासों को धूमिल करती नज़र आ रही है| सबसे बड़ी बात की अब इस नीति की वजह से कुछ जानलेवा consequences भी सामने आ रहे हैं|  प्रदेश की आबकारी नीति में बहुत से ऐसे झोल हैं जो शराब माफिया को price variance के ज़रिये नकली और ज़हरीली शराब सप्लाई करने का मौका दे देता है|

 


 

शराब से Revenue कमाने के हजारो तरीके है, डायरेक्ट टैक्सेज बढाने का तरीका इस मामले में गलत साबित हो रहा है क्यूंकि अगल बगल के प्रान्तों में वही शराब सस्ते दामों में मिल रही  हैं| अगर माननीय मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह सूबे मैं शराब पर कर इसलिए लगाना चाहते है ताकि पीने वालो को हौंसले पस्त हो तो उनके जज़्बे को हम पूरा सम्मान देते हैं, साथ ही हमारा सुझाव है की सरकार शराब की बोतल से परोक्ष कर हटा कर परमिट व्यवस्था लागू कर दे|

क्यूँ ना आम आदमी पर शराब के परमिट की व्यवस्था लागू कर दी जाए

शराब के परमिट की व्यवस्था सन १९३५ में अंग्रेजो ने मुंबई में लागू की थी| इसके अंतर्गत हर शराब पीने वाले को परमिट लेना अनिवार्य था| इस परमिट के लिए उन्हें सालाना एक शुल्क देना पड़ता था| परमिट ना होने या फिर expire होने की स्थिति में पुलिस को जुर्माना वसूलने का अधिकार था जिसे आबकारी विभाग के साथ शेयर किया जाता था| वर्तमान परिपेक्ष्य में एक डिजिटल परमिट कार्ड की व्यवस्था की जा सकती है| शराब की दुकानों पर क्यू आर कोड की व्यवस्था को अनिवार्य किया जा सकता है|



डिजिटल  लिकर परमिट कार्ड का ले आउट प्लान

Hypothetically कल्पना कीजिये, एक ग्राहक शराब की दुकान पर जाता है, अपना परमिट दुकानदार को देता है, दुकानदार ऑनलाइन व्यवस्था के अन्दर परमिट का कोटा चेक करता है और परमिशन होने पर उस व्यक्ति को शराब बेच देता है| रास्ते में पुलिस के द्वारा चेकिंग होने पर वो व्यक्ति, अपना वैध परमिट और शराब की दुकान से मिली रसीद दिखा कर साबित करता है की वो वैध शराब पी रहा है|



सन १९३५ मैं अंग्रेजो ने परमिट को एक “Check & Balance” के अंतर्गत लागू किया था| महंगे परमिट की वजह से उस समय के मजदूर कम शराब पीते थे क्यूंकि एडिशनल शराब के लिए उन्हें बड़े परमिट की ज़रूरत होती थी| पुलिस के पास शराबियो को काबू रखने के लिए एक ऐसा क़ानून था जो सीधे सीधे revenue को सपोर्ट करता था|

आज डिजिटल ज़माने में परमिट व्यवस्था के आने के बाद शराब के दाम बढ़ाये बिना ही मध्य प्रदेश सरकार या कोई भी सरकार बिना शराबियो की जान खतरे में डाले revenue बढ़ा सकती है और मद्य निषेध विभाग द्वारा तय किये गए objectives और मानदंडो पर भी खरी उतर सकती है|  

 अपने सुझाव और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में हमारे साथ शेयर कीजिये और इस स्पेशल कवरेज में सिटीजन journalist बन कर अपना योगदान दीजिये|



 

 

 

 

Post a Comment

Previous Post Next Post