मुरेना में जहरीली शराब से होने वाली मौतों का “आबकारी विभाग कनेक्शन”

 

मुरेना में हाल ही में हुई मौतों ने एक बार फिर से सिस्टम को झिंझोड़ दिया है| आम तौर पर इसका ठीकरा पुलिस विभाग की लापरवाही पर फोड़ा जाता है| मगर बेचारी पुलिस करे क्या? ख़ास तौर से उन हालातो में जब ज़हरीली शराब की मार्केटिंग की ट्रिक तो आबकारी विभाग ने खुद अविष्कार की है और ज़हर के इन सौदागरों को पकड़ा दी है|

 पहले सरकारी बूटलेगिंग  फार्मूला समझिये 

अठारहवी और उन्नीसवी सदी के में जब अमेरिका पर अंग्रेजो और फ्रेंच लोगो का राज था, तब बूटलेगिंग की शुरुआत हुई| बूटलेगिंग एक किस्म की सरकारी लूट है जहाँ दो पडोसी राज्य गुपचुप एक इकरारनामा करते है, एक राज्य जान बूझकर अपने यहाँ शराबबंदी कर देता है और दुसरे राज्य के तस्कर सरकारी अफसरों को पैसा देकर बंदी वाले राज्य में शराब की smuggling करते हैं| जो काला पैसा कमाया जाता है वो दोनों पडोसी राज्यों के शासको और प्रशासको में बंट जाता है|  कर चोरी और भ्रष्टाचार दोनों हो जाता है और जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता और शराबी तो शराबी है जिस भी भाव मिले उन्हें तो पीना ही है|

 


उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश के आबकारी कर में अंतर का समीकरण समझिये

मध्य प्रदेश सरकार ने शराब पर सबसे ज्यादा कर लगाया है, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की तुलना में शराब यहाँ तकरीबन दुगुने दामो में मिलती है| यही कारण है की मुरेना और धौलपुर के बीच अल्लाबेली चौकी पर तस्करी की शराब पकडे जाने के किस्से आम है| ज़हरीली शराब के निर्माता इस बात का फायदा उठाते हैं और कच्ची भट्टियो में बनी शराब को राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हरियाणा से आई हुई शराब कह कर बेचते हैं| बेचारे पियक्कड़ पैसे बचाने के लिए ये मिलावटी शराब पीकर अपनी आत्मा का परमात्मा से मिलन करवा बैठते हैं|



जी एस टी के ज़माने में शराब के दामो में इतना फर्क क्यूँ?

एक टैक्स एक भारत के ज़माने में आखिर उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में शराब के दामो में इतना अंतर क्यूँ है? भाषा, अर्थव्यवस्था और जीवन शैली के हिसाब से तीनो राज्य तकरीबन एक ही जैसे हैं, इसके बाद भी इतना अंतर क्यूँ है? सबसे बड़ी बात शराब को लेकर योगी जी और शिवराज जी के आर्थिक ज्ञान और दार्शनिक सोच में इतनी भिन्नता क्यूँ है?  कहीं ये तीन राज्यों के बीच का बूटलेगिंग अरेंजमेंट तो नहीं है? कहीं ये बूट लेगिंग ही तो वो मूल कारण नहीं है जिसकी वजह से अशोक गहलोत जी की कुर्सी जाने के समय महारानी श्रीमती विजयाराजे सिंधिया ने इतनी प्रो एक्टिव भूमिका निभा कर उन्हें बचाया था?

ऊपर लगाये गए सारे आरोप महज कपोल कल्पना है| पोपुलर मीडिया और जनमानस दबी आवाज़ में इस तरह की बाते अक्सर करते हैं| ये चर्चाये और भी ज्यादा सरगर्मी तब पकड जाती हैं जब जहरीली शराब पीने से लोग मरते हैं, मामला गर्म होता है, फिर ठंडा पड़ जाता है ताकि कच्ची शराब की भट्टिया फिर गर्म हो जाये|


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