फ़ास्टफ़ूड खबर : सनसनी से वायरल सुरसुरी तक

2020 ने हमें बताया की भारतवर्ष में चार तरह के पत्रकार पाए जाते हैं, डिज़ाइनर पत्रकार, हिंदुत्ववादी पत्रकार, राईट विंग पत्रकार और वास्तविक पत्रकार| वास्तविक पत्रकारों पर कमेंट करने के लिए तो बहुत छोटा हूँ में, बस उन्हें सलाम कर सकता हूँ, मगर बाकी के जो पत्रकार है उनके बारे में कुछ कहना है मुझे| दरअसल ब्रेकिंग न्यूज़ की आड़ में इन तीन तरह के पत्रकारों ने फ़ास्ट फ़ूड खबर के कल्चर को जन्म दिया है| ये लोग या तो सनसनी फ़ैलाने के लिए खबर गढ़ते हैं या फिर खबर के नाम पर वो सुरसुरी पटाखे फोड़ते है जो वायरल तो होते हैं मगर मौसमी बुखार की तरह उतर भी जाते हैं| गौर से सोचिये ब्रेकिंग न्यूज की बारिश और वायरल न्यूज़ के ओलों के बीच एक चीज़ कहीं दब गयी है जो आज से सैकड़ो साल बाद डिजिटल सभ्यता की खुदाई में बाहर निकलेगी| जी हाँ खबर का असर कहीं गुम हो गया है, अब खबर उस गुदगुदी की तरह होती है जिसे किसी भी सुधार या दवा की ज़रूरत नहीं है| खबर अब बदलाव नहीं लाती, खबर तो बस आती है और चली जाती है|
सन 2020 में वैज्ञानिक कोरोना का टीका नहीं ढूंढ पाए और इंडियन मीडिया स्वर्गीय सुशांत सिंह राजपूत के कातिलों तक नहीं पहुँच पाया| कोरोना के नए वर्शन आते रहे और सुशांत सिंह राजपूत के कत्ल की नयी कहानिया आती रही| इसे कहते हैं सुरसुरी खबर, कल तक जो सुशांत के वारियर थे, आज वो बिग बॉस का लेखा जोखा दिखा रहे हैं| तबलीगी जमात में कोरोना वायरस ढूंढ रहे पत्रकारों को अब बिना मास्क के घूम रहे राजनेता और और उनके फ्यूचर बाहुबली नज़र नहीं आ रहे हैं| वैसे कोरोना जब शुरू हुआ था तब वो गब्बर सिंह की तरह था, जिसका नाम सुनकर आसपास के पचास घरो में माँ अपने बच्चो से कहती थी “ मास्क पहन ले वर्ना कोरोना आ जाएगा|” आज वो कोरोना धर्मेन्द्र बन गया और डायबीटीस और दूसरी बीमरियों से पीड़ित, कमज़ोर इम्युनिटी के लोगो को चुन चुन कर मार रहा है|
बात जब हीरो विलन की हो तो पिछले साल फ़ास्ट फ़ूड खबर ने विकास दुबे की खबर को भजिया पाव की तरह बेचा है| विकास दुबे हतो वा, एक्सीडेंट वा, एन्काउन्टर वा, मीडिया की रिपोर्टिंग बस सतही सवालो तक सिमटी थी, दरअसल उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर के कलयुगी संस्करण की तरह रिपोर्टिंग की, सिर्फ वो मुद्दे उछाले गए जिन पर उनके आकाओ की मोहर थी| विकास दुबे के मुद्दे को आज तवज्जो दिए जाने की ज़रूरत है जब ऑफिशियली साठ पुलिस वालो का नाम उसके काले कारोबारों से जुड़ गया है| लाइन हाज़िर, लूप लाइन या सस्पेंशन जैसे कान उमेठने के बराबर के दंड पाकर ये पुलिस वाले आराम से सेवानिवृत जीवन जियेंगे| आप और हम जैसे आम आदमी बस छब्बीस जनवरी को फिल्म कर्मा और उपकार के गाने सुन कर अपने रोम रोम में बसी देशभक्ति की मालिश करते रहेंगे|
विकास दुबे ने सिर्फ अपराध नहीं किये थे, उसने अपराधो की पूरी इंडस्ट्री बसाई थी, मगर मीडिया को वो इंडस्ट्री कभी नज़र ही नहीं आई| अगर साठ पुलिस वाले ज़िम्मेदार हैं तो कल्पना कीजिये कितने राजनेता भी ज़िम्मेदार होगे, आखिरकार Crime Industrialist विकास दुबे ने अपने अपना कारोबार हर सरकार को टैक्स देकर चलाया है| सच तो ये है की हम मुद्दों का फॉलोअप करना भूल गए हैं| सच ये है की हम शायद अब खबरों की विवेचना करना भूल गए हैं| हमें चाहिए फ़ास्टफ़ूड खबर, यानी सब कुछ रेडी हो जहाँ| मीडिया का पहला काम होता है सवाल उठाना और दूसरा सवाल होता है हमारे सवालो को अथॉरिटी तक पहुँचाना| ज़रा गौर से देखिये कितनी बार ऐसा होता है? सच तो ये है की मीडिया के पास फॉलोअप का टाइम नहीं है, उन्हें बस टी आर पी की चिंता है, टी आर पी से ज्यादा उन्हें चिंता है पी आर की| इसलिए अब आप भी अपनी preference चेक कीजिये और२०२१ का पहला प्रण ये लीजिये की जिस तरह आपने कोरोना के डर से फ़ास्ट फ़ूड को बाय कहा है उसी तरह, फ़ास्ट फ़ूड खबर को भी बाय बाय कहिये|

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